सवाई भोज मन्दिर आसीन्द मेला इतिहास जन्म स्थान बगड़ावत गोठा मालासेरी

सवाई भोज चौहान अथवा रावतभोज या राजाभोज, जो बगड़ावत चौहान गुर्जर राजवंश के सबसे प्रतापी वीर राजा थे। यह विष्णु के अवतार भगवान देवनारायण जी के पिताजी ही थे। सवाई भोज मन्दिर आसीन्द से दो किलोमीटर पूर्व में है।

सवाई भोज मन्दिर कहा पर है

यह वह स्थल हैं। जहां बगडावत भारत नामक युद्ध हुआ था। आशा बगडावत ने अपने नाम से ग्राम आसीन्द बसाया था। यह मन्दिर, भीलवाडा जिले मे खारी नदी के तट पर आसीन्द, से दो किलोमीटर पुर्व दिशा में ब्यावर भीलवाड़ा मार्ग पर सवाईभोज मंदिर हैं। जो युद्ध स्थल पर बना हैं 500 बीघा भुमी मंदिर के अधीन हैं।

वीर तेजाजी मंदिर हरसौर नागौर

सवाई भोज मन्दिर आसीन्द मेला कब लगता है

श्री सवाई भोज मंदिर आसींद पर मेला भादवा सुद छठ को लगता है। यहां साल में भादवा शुक्ल पक्ष में छट से अष्टमी को तीन दिन का मेला लगता है। इस समय यहाँ पर लाखो की संख्या में श्रद्धालु आते है।

सवाई भोज मन्दिर के बारे में

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मान्यताओ के आधार पर इस स्थान पर सवाई भोज ने अपना शरीर छोड़ा, जहां मंदिर है। मन्दिर के पास में खारी नदी पर देवी ने सिर उतारने के बाद यहां पर धड़ गिरी थी।
यहां समीप ही पुरानी मूर्ति है। अब नया मंदिर भी सवाई भोज, साढ़ू माता और देवनारायण का बन गया है। मान्यता और आस्था लोगों में इस स्थान की ज्यादा है।
दोनों मंदिरों में सवाई भोज, साढ़ू माता और देवनारायण की मूर्तियां। पुराने मंदिर के परिसर में इनके अतिरिक्त नेहाजी, भूंणाजी, मैदूजी, भैरूंजी और नाथ गुरू गुसांईजी के मंदिर भी हैं।

यहाँ लोग श्रृद्धा से अपनी जात देते हुए, प्रसाद सामग्री चढ़ाते हैं। वहीं भोपा पुजारियां की देवलियां भी हैं। नये मंदिर परिसर में चारों ओर दिवारों पर बगड़ावत और देवनारायण गाथा का पूरा चित्रांकन अंकित है। जिसे लोग रूचि से देखते हैं। पुराने मंदिर पर गूजरों के अतिरिक्त भी सभी जातियां के स्त्री-पुरूष दर्शन और फेरी के लिये यहां आते हैं। मंदिर के आगे पालणै, सूत के डोरे /कसणै और मालाएं मनौति में बंधी जाती है। शारीरिक, संतान प्राप्ति, कृषि, पशुधन, व अपने धन्धे के लिये ही लोग बोलमा बोलते हैं। प्रासाद में नारियल और फूलियां के साथ धूंप के लिये अगरबत्ती चढ़ाते हैं। बाहर इन्हीं की दूकानें अधिक हैं। जो साथ में फोटो और गीतों की डीवीडी आदि भी बेचते हैं। उसके प्रचार का खूब शोर गूंजता है।

देवनारायण की शायरियां

सवाई भोज में अन्य मन्दिर व स्थान

  • यहां पर सवाईभोज के मंदिर के अलावा अन्य बगडावतो के मंदिर भी हैं।
  • छोछु भाट का मंदिर भी हैं।
  • यहां बगडावतो के पुत्र भुणा जी , भांगी जी व देवनारायण के मंदिर भी हैं।
  • यहां सती स्थल भी है। जहां लोग जैमती’ के मंदिर में दर्शन करते हैं और स्नानादि भी तालाब में करते हैं। यह तालाब ‘राठौड़ी’ नाडी के रूप में भी जाना जाता है।
  • राणी जयमती का मंदिर यही हैं।
  • बगडावतो की 23 राणियां जो सती हुई थी, उनकी देवलियां यहां बनी हैं।
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सवाई भोज से सम्बंधित अन्य स्थान

  • ताम्बेसरी बावडी – यह बावडी सवाईभोज से पुर्व में 9 किलोमिटर पर हैं। बगडावतो ने इसे
    बनवाया था।
  • मालासेरी डुंगरी – ताम्बेसर बावडी से थोडी दुर यह डुंगरी हैं, जहां पर भगवान देवनारायण का जन्म हआं था।
  • देवमाली- यहां देवनारायण का प्राचीन विशाल मंदिर हैं।  यह आसीन्द से 40 किलोमीटर दुर हैं। यहां देवनारायण ने निवास किया था।
  • वरना धाम – यहां भी देवनारायण का मंदिर हैं। अन्त समय में देवनारायण यही रहते थे!
  • गढगौठा (दडावट) – को श्री देवनारायण, भूणाजी, मेंदू जी तथा भांगीजी ने माता साडू के
    आदेश पर पुन: बसाया था। यहां रहते हुए माता साडू की कामना ( राणा को जीतकर ) पुरी की थी।
  • रायला – यह कस्बा भी भीलवाडा में आसीन्द से 30-40 किमी पर बसा हैं। सवाईभोज की पुत्री दीप कंवर यहां विवाही थी। उसने राणा से युद्ध किया तथा प्राण गवाये।  कहावत है की और जगह तो वीर लडते हैं, रायला मे लडे लुगाई “दीप कंवर” के युद्ध के कारण बनी हैं।
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